किताबे झांकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाकाते नही होती
जो शामें इनकी सोहबत में कटा करती थी अब अक्सर
गुजर जाती है कंप्युटर के परदों पर
बड़ी बेचैन रहती है किताबे ....
इन्हे अब नींद में चलने की आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती है ..
जो कदरें वो सुनाती थी
की जिन के सैल कभी मरते थे
वो कदरें अब नज़र आती नही घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थी
वह सारे उधडे उधडे हैं
कोई सफहा पलटता हूँ तो एक सिसकी निकलती है
कई लफ्जों के माने गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंडे लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई माने नही उगते
बहुत सी इसतलाहें हैं
जो मिटटी के सिकूरों की तरह बिखरी पड़ी है
गिलासों ने उन्हें मतरुक कर डाला
जुबान पर जायका आता था जो सफहे पलटने का
अब उंगली क्लिक करने से बस इक झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह बा तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था ,कट गया है
कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे ,छुते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने ,गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!
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Tuesday, July 26, 2011
Monday, July 4, 2011
फिर कही कोई फुल खिला....
फिर कही कोई फुल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कही कोई दिप जला, मंझिल ना कहो उसको
मन का समंदर प्यासा रहा,
क्यु किसिसे मांगे दुवा
लहरोका चला जो मेला
तुफा ना कहो उसको
फिर कही कोई फुल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कही कोई दिप जला, मंझिल ना कहो उसको
देखे सब वो सपने
खुद ही सजाये जो हमने
दिल उनसे बहेल जाये तो
राहत ना कहो उसको
फिर कही कोई फुल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कही कोई दिप जला, मंझिल ना कहो उसको
- गुलझार (चित्रपट - अनुभव)
मला माहिती नाही की याला कविता म्हणावं की नाही.
फिर कही कोई दिप जला, मंझिल ना कहो उसको
मन का समंदर प्यासा रहा,
क्यु किसिसे मांगे दुवा
लहरोका चला जो मेला
तुफा ना कहो उसको
फिर कही कोई फुल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कही कोई दिप जला, मंझिल ना कहो उसको
देखे सब वो सपने
खुद ही सजाये जो हमने
दिल उनसे बहेल जाये तो
राहत ना कहो उसको
फिर कही कोई फुल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कही कोई दिप जला, मंझिल ना कहो उसको
- गुलझार (चित्रपट - अनुभव)
मला माहिती नाही की याला कविता म्हणावं की नाही.
Thursday, September 30, 2010
मेरी आवाज ही
मला माहित नाही याला गाणं म्हणायच की कविता. पण माझं हे अतिशय आवडत गाणं आणि तेव्हढेच आवडते शब्द.
माझ्या आवाज हरवलेल्या मित्रास....
नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
वक्तके सितम कम हसी नही, आज है यहा कल कही नही
वक्तके परे अगर मिल गये कही
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
जो गुजर गयी कल की बात थी, उम्र तो नही एक रात थी
रात का सिरा अगर फिर मिले कही
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
दिन ढले जहा रात पास हो, जिंदगी की लौ उन्ची कर चलो
याद आये गर कही जी उदास हो
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
- गुलझार
हे गाणं इथे ऎकता / पाहता येईल
http://www.youtube.com/watch?v=VTTPentp0_g&feature=related
माझ्या आवाज हरवलेल्या मित्रास....
नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
वक्तके सितम कम हसी नही, आज है यहा कल कही नही
वक्तके परे अगर मिल गये कही
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
जो गुजर गयी कल की बात थी, उम्र तो नही एक रात थी
रात का सिरा अगर फिर मिले कही
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
दिन ढले जहा रात पास हो, जिंदगी की लौ उन्ची कर चलो
याद आये गर कही जी उदास हो
मेरी आवाजही पेहेचान है, गर याद रहे
- गुलझार
हे गाणं इथे ऎकता / पाहता येईल
http://www.youtube.com/watch?v=VTTPentp0_g&feature=related
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